चिश्ती ने जिस ज़मीं पे पैग़ामे-ए-ह़क सुनाया
नानक ने जिस चमन में वहदत का गीत गाया

तातारियों ने जिस को अपना वतन बनाया
जिस ने हिजाज़ियों से दश्त-ए-अरब छुड़ाया

मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है
यूनानियों को जिस ने हैरान कर दिया था

सारे जहां को जिस ने इल्म ओ हुनर दिया था
मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है

तुर्कों का जिस नें दामन हीरों से भर दिया था
मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है

टूटे थे जो सितारे फ़ारस के आसमां से
फिर ताब दे के जिसने चमकाए कहकशां से

वहदत की लय सुनी थी दुनियां ने जिस मकां से
मीर-ए-अरब को आई ठण्डी हवा जहां से

मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है
बंदे कलीम जिस के पर्बत का सीना

नूह-ए-नबी का आ कर ठहरा जहां सफ़ीना
रिफ़अत है जिस ज़मी की बाम-ए फलक का ज़ीना

जन्नत की ज़िंदगी जिस की फ़ज़ा में जीना
मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है

-मोहम्मद अल्लामा इकबाल
जन्म: 09 नवम्बर 1877
निधन: 21 अप्रैल 1938

पैग़ामे-ए-ह़कः सच का संदेश , वहदतः एकता ,
फ़ारसः ईरान , सफ़ीनाः नाव , रिफ़अतः ऊँचाई ,
बाम-ए फलकः आसमान की छत ,
स्रोतः रसरंग

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तपती गर्मी में जिस दरख्त ने राहत दी थी
आज पतझड़ हुआ तो कुल्हाड़ी तलाशते हो

कोपलें आएँगी और फल भी ये तुम्हें देगा
क्यों उम्मीदों की शाख को अभी तराशते हो

फूलने-फलने को कुछ खाद-पानी दो तो सही
करो मेहनत निठल्ले रहके क्यों विलासते हो

जिसने चाहा है उसे मिला है तुम आजमा लो
हौसले खोते हो क्यों हिम्मतें क्यों हारते हो

ये दुनिया गोल है समय का चक्र गोल ही है
कल वहां और थे तुम जिस जगह विराजते हो

सभी कुछ आसमां से इस ज़मीं पर दिखता है
क्यों अपने कृत्यों पे तुम उजला पर्दा डालते हो

यहाँ दामन पे सबके दाग़ है छोटा ही सही
क्यों हंसके दूसरों की पगड़ियाँ उछालते हो
-कवि अशोक कश्यप

हर पल हलचल, पल-पल हलचल
कहे ज़िन्दगी चल आगे चल,
चल आगे चल, चल आगे चल

है तो सब-कुछ मगर नहीं कुछ
अगर नहीं संतोष कहीं है
स्वर्ग कही नहीं आसमान में
ढूँढो वो तो यही-कही है
मन खुश है तो तन भी है खुश
तन खुश पर काहे का अंकुश
अंकुश सदा ही बुरा न रहता
बुरे-भले की समझ वो कहता
इससे शिक्षा लेता तू चल
हर पल हलचल पल-पल हलचल ………..

शुद्धि मन की, है सिद्धि तन की
अशोक ये सब से कहता है
तब तक शांति-समृद्धि न मिलती
जब तक मन मैला रहता है
जन सेवा भारी बलशाली
किन्तु सोच न हो छल वाली
छल से गल जाती है आत्मा
निश्छल चाल होए मतवाली
यही चाल देती सबको बल
हर पल हलचल पल-पल हलचल……

कहे ज़िन्दगी, चल आगे चल,
चल आगे चल, चल आगे चल
हर पल हलचल पल-पल हलचल
–कवि अशोक कश्यप

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खुशबू जैसे लोग मिले अफ़साने में
एक पुराना खत खोला अनजाने में

जाना किसका ज़िक्र है इस अफ़साने में
दर्द मज़े लेता है जो दुहराने में

शाम के साये बालिस्तों से नापे हैं
चाँद ने कितनी देर लगा दी आने में

रात गुज़रते शायद थोड़ा वक्त लगे
ज़रा सी धूप दे उन्हें मेरे पैमाने में

दिल पर दस्तक देने ये कौन आया है
किसकी आहट सुनता है वीराने मे ।

—-प्रस्तुतकर्ता संदीप भारद्वाज

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