चिश्ती ने जिस ज़मीं पे पैग़ामे-ए-ह़क सुनाया
नानक ने जिस चमन में वहदत का गीत गाया

तातारियों ने जिस को अपना वतन बनाया
जिस ने हिजाज़ियों से दश्त-ए-अरब छुड़ाया

मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है
यूनानियों को जिस ने हैरान कर दिया था

सारे जहां को जिस ने इल्म ओ हुनर दिया था
मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है

तुर्कों का जिस नें दामन हीरों से भर दिया था
मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है

टूटे थे जो सितारे फ़ारस के आसमां से
फिर ताब दे के जिसने चमकाए कहकशां से

वहदत की लय सुनी थी दुनियां ने जिस मकां से
मीर-ए-अरब को आई ठण्डी हवा जहां से

मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है
बंदे कलीम जिस के पर्बत का सीना

नूह-ए-नबी का आ कर ठहरा जहां सफ़ीना
रिफ़अत है जिस ज़मी की बाम-ए फलक का ज़ीना

जन्नत की ज़िंदगी जिस की फ़ज़ा में जीना
मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है

-मोहम्मद अल्लामा इकबाल
जन्म: 09 नवम्बर 1877
निधन: 21 अप्रैल 1938

पैग़ामे-ए-ह़कः सच का संदेश , वहदतः एकता ,
फ़ारसः ईरान , सफ़ीनाः नाव , रिफ़अतः ऊँचाई ,
बाम-ए फलकः आसमान की छत ,
स्रोतः रसरंग

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